उत्तराखंड गायन होली की अवधि सबसे लंबी होती है

उत्तराखंड गायन होली की अवधि सबसे लंबी होती है

होली सैकड़ों वर्षों  से रंग-गुलाल, मस्ती और पकवानों का त्योहार रहा है। उत्तराखंड का संस्कृति सचेतन इलाका कुमाऊं और गढ़वाल-दोनों जगह पवित्र पौधे की डाल लाकर लगाने, पूजने, चीर बांधने-बांटने,बैठी-खड़ी होले का फर्क निभाने और महिलाओं का स्वांग निभाने आदि अनेक ऐसी चीजें हैं जो बहुत ही खास है और होली में गायन  इसे और भी खास बनाती है। ये होली गीत निर्वाण, भक्ति, शृंगार और वियोग प्रधान होते हैं।

होली गीतों में भी कुमाऊं में शास्त्रीयता पर ज्यादा जोर रहा है । अल्मोड़ा से न केवल इसकी शुरुआत हुई, बल्कि यहां के हुक्का क्लब जैसे संगठनों की इसमें ऐतिहासिक भूमिका प्रमाणित है। जबकि गढ़वाल के नृत्यगीतों में ब्रजमंडल के गीतों का गढ़वालीकरण ज्यादा हुआ है। उत्तराखंड के होली गीतों की और कई विशेषताएं ध्यान देने लायक है। जैसे,यहां के होली गीतों में शिव का आवाहन है, जो मैदानी होली में नहीं है, कामदेव को भस्म कर देने वाले प्रसंग में शुरुआती दौर में भले रहा हो। वह तो आश्चर्य का विषय है। महिलाओं द्वारा यहां होली गायन की अलग से जो स्वांग परंपरा है, वह पुरुषों के सामूहिक पलायन के कारण कदाचित अधिक मजबूत हुई है, जिसमें विरह,रोमांस और पीड़ा है।

ऐसे ही पहाड़ की होली में सर्वधर्मसमभाव के चित्र भी मिलते हैं। अल्मोड़ा में होली गायन की जिस शास्त्रीय परंपरा ने जड़ पकड़ी, उसमें मुस्लिम गायकों का योगदान था। पौड़ी में होली गायन कभी बड़े याकूब के नेतृत्व में होता था, तो 1935 में श्रीनगर की होली बैठकों में ईसाइयों के भाग लेने का जिक्र है। कहते हैं, कभी तवायफें भी होली गायन में सम्मिलित होती थीं। इसमें कोई शक नहीं कि समय के अंतराल में पर्व-त्योहार और उसे मनाए जाने के तरीके बदल जाते हैं। होली की शुरुआत ‌जिस मदनोत्सव से मानी जाती है, आज की होली उसकी परंपराओं को भी भला कहां बरकरार रख पाई है!

यह मानने का भी कोई कारण नहीं कि मैदान में होली का मौजूदा रूप अशिष्ट ही है। बल्क‌ि कोई त्योहार आज अगर ग्रामीण जीवन की सबसे ईमानदार प्रतिच्छवि है, तो वह होली ही है। लेकिन उत्तराखंड में होली की संस्कृ‌ति को जिस तरह बचाए रखा गया है, वह गौरतलब जरूर है।

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