माँ भगवती कोट भ्रामरी डंगोली, बागेश्वर (कौतिक) मेले का इतिहास

माँ भगवती कोट भ्रामरी डंगोली, बागेश्वर (कौतिक) मेले का इतिहास

माँ भगवती कोट भ्रामरी (कोटक माई) का मंदिर अल्मोड़ा से ग्वालदम जानेवाले रास्ते पर बैजनाथ से 3 कि.मी. की दूरी पर ऊँची चोटी पर स्थित है। इस स्थान पर कभी कत्यूरी राजाओं ने अपना किला बनवाया था। गढ़वाल यात्रा के समय जगतगुरु शंकराचार्य भी इस स्थान पर कत्यूरी राजाओं के अतिथि बने थे। उन्होंने बैजनाथ मंदिर की शिला की यहाँ प्राणप्रतिष्ठा की और पूजन आरम्भ करवाया। बाद में वे ही कोटा की माई के नाम से पूजित हुई।

एक कथा यह भी है कि एक समय यह समूची कत्यूरी घाटी जल प्लावन के कारण पानी में डूबी हुई थी तथा जल के भीतर अरुण नामक दैत्य ने अपनी राजधानी बनाई हुई थी, इस दैव्य के आतंक से परेशान देवताओं को प्राण देने के लिए शक्ति रुपा देवी ने भ्रामरी रुप धारण कर दैव्य का अंत किया था। इन्द्र की प्रार्थना पर माँ भगवती ने भ्रामरी रुप धारण कर हरछीना पर्वत को तोड़कर जल के निकास का आदेश दिया और जब पानी समाप्त होने पर अरुण अपनी राजधानी से बाहर आया तो उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी। यह देवी तब से कोट की भ्रमरी के नाम से पूजित हुई। चंद राजाओं के शासन काल में नंदादेवी, कोट मंदिर के नीचे झालामाली गाँव में स्थापित थीं। तब से मेलाडुंगरी के भन्डारी ठाकुर उनकी पूजा का कार्य सँभालते हैं।

चंद राजाओं के शासनकाल में बकरों तथा भैंसे की बलि* नीचे ही दी जाती थी उस समय नंदादेवी का मेला हर तीसरे वर्ष नीचे ही लगता था लेकिन अब भ्रामरी के मंदिर में चेत्र की अष्टमी को प्रति वर्ष मेला लगता है। बाद में नंदा की स्थापना भी कोट में भ्रामरी के साथ की गयी। चंद वंशीय राजा जगतचंद ने ग्राम झालामाली तथा ग्राम डूंगरी मंदिर को गूँठ में चढ़ाया। रोज चंड़ी पाठ के लिए भेंटा ग्राम के लोहूमी ब्राह्मणों को नियुक्त किया। जखेड़ा के पड्यारों ने हर वर्ष मेला बनाने का निर्णय लिया और अब उनकी ओर से भंडारा होता है।

प्राय: मेला तीन दिन में सम्पन्न होता है नौटी गाँव से आया हुआ नंदाराजजात का पूजा का सामान यहाँ पहले से ही मंगा लिया जाता है मेला आरम्भ होने पर सबसे पहले नंदा की जागर लगाने वाले जगरिये न्योते जाते हैं, ये जगरियें भेटी ग्राम से आते हैं। चंद राजाओं ने जागर लगाने की एवज में इन जगरियों को भेटी ग्राम में जमीन दी थी। तब से परम्परा बनी हुई है कि जगरिये मेले में जागर लगाने के लिए न्योते जायेंगे। पंचमी को जगरिये न्योते जाते हैं तथा षष्ठी एवं सप्तमी को जागर लगती है। सप्तमी के दिन केले के स्तम्भ लाने से पहले केले के खामें का पूजन करने के बाद इनसे प्रतिमा का निर्माण किया जाता है, केले का वृक्ष मवाई गांव से लाया जाता है जिसे माँ भगवती खुद काटती है। प्रतिमा निर्माण को देवी का डिकरा बनाना कहा जाता है। बताया जाता है कि प्रतिमा का श्रंगार चंद राजाओं के समय में एक लाख रुपये का व्यय होता था। अब इस धरोहर सुरक्षा की जिम्मेदारी द्योनाई के बोरा लोगों की है। वे ही देवी के श्रंगार का सामान उत्सव के मौके पर मंदिर में लाते हैं। जेवर को भी ढ़ोल-नगाड़ों के साथ ही लाया जाता है।
अपराह्म ४ बजे तक देवी की प्रतिमा तैयार हो जाती है। पुजारी के ऊपर देवी अवतरित होती है। रात्रि में भैंसे का बलिदान होता है। महिष को मेला ड़ूँगरी के लोग आते हैं। दूसरा बलिदान* अष्टमी के दिन अपराह्म डेढ़ बजे होता है। तब तक भारी सँख्या में दूर दराज के गाँवों से आये श्रद्धालु जमा हो जाते है। सायं डोला उठने से पहले देवी का भोग लगाया जाता है । यह भोग छत्तीस प्रकार के व्यंजनों से तैयार किया जाता है । व्यंजन बनाने के लिए रसोईया गाँव से विशेष रुप से आता है । देवी को भोग लगाने की जिम्मेदारी इसी रसोईये की है। सभी कार्य सम्पन्न हो जाने पर ही डोला उठता है। अवतरित देवी को जगह-जगह नचाया जाता है। अन्त में डोला झालामाली गाव होता हुआ देवीधारा नामक जल धाराओं के पास पहुँचता है। जहाँ देवी प्रतिमा का प्रतिष्ठापूर्वक विसर्जन किया जाता है।

*हम किसी भी तरह के बलि प्रथा का समर्थन नही करते है  एवं विस्वास करते है की कोई भी देवी -देवता हिंसा नहीं करते
तथा लोगो से भी निवेदन करते है की समाज से कुप्रथा को हटाने मे अपना सहयोग दे।

यह लेख जिस किसी का सज्जन को हो कृपया दावा करे, हमें उनका नाम सम्मलित करने में ख़ुशी होगी।

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