रोम ने शुरू की थी बसंत पूजन की परंपरा

रोम ने शुरू की थी बसंत पूजन की परंपरा

बसंत के पूजन की यह परंपरा असल में रोम से शुरू हुई थी। रोम की पौराणिक कथाओं के अनुसार फूलों की देवी का नाम ‘फ्लोरा’ था। इसको लेकर वहां कुछ कहानियां भी हैं। वहां फूलों से सजी एक खूबसूरत किशोरी के रूप में बसंत को पूजा जाता है। ‘फ्लोरा’ शब्द लेटिन भाषा के ‘फ्लोरिस’ से लिया गया है जिसका अर्थ होता है ‘फूल’। वहां इसके लिये विशेष तौर पर छह दिन तक ‘फ्लोरिया महोत्सव’ मनाया जाता था जिसमें देवी ‘फ्लोरा’ यानि बसंत की पूजा होती थी। इसी तरह से यूनान में एक देवी क्लोरिस की पूजा की जाती थी। रोमन कवि पबलियस ओविडियस नासो (जो ओविड के नाम से अधिक मशहूर हैं) की किताब  ‘फास्टी’ में एक पौराणिक कथा का जिक्र है जिसके अनुसार क्लोरिस को पश्चिमी हवा के अवतार और बसंत के जनक जेफाइरस ने चूमा जिससे वह ‘फ्लोरा’ में तब्दील हो गयी। यह भी कहा जाता है कि सैबाइन जाति के राजा टाइटस टैटियस ने रोम का इस देवी से परिचय कराया था। देवी ‘फ्लोरा’ का 268 ईसा पूर्व में पहला मंदिर बनाया गया था और 238 ईसा पूर्व से ‘फ्लोरिया महोत्सव’ 28 अप्रैल से तीन मई के बीच मनाया जाने लगा। आज भी वहां कुछ स्थानों पर विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में इस महोत्सव का आयोजन होता है। रोम में यह सूर्य पर आधारित कैलेंडर की शुरुआत होती है जबकि हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार सूर्य कैलेंडर की शुरुआत चैत्र संक्रांति से मानी जाती है।

फ्लोरा को रोम में एक ऐसी देवी के रूप में प्रदर्शित किया जाता है जो बासंती वस्त्रों में लिपटी है, जिसके हाथों में फूलों की टोकरी और सिर पर फूल और पत्तों का मुकुट है। फूलों से बनने वाला शहद इस देवी को अर्पित किया जाता है। ‘फ्लोरा’ नाम अब भी वहां पेड़ पौधों के लिये उपयोग ​किया जाता है।

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